सम्पादकीय
14 अक्टूबर 1956, नागपुर की पवित्र दीक्षाभूमि। यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास में सामाजिक क्रांति के एक नए अध्याय की शुरुआत थी। इसी दिन भारतीय संविधान के शिल्पकार, महामानव डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म स्वीकार किया। यह निर्णय किसी के प्रति घृणा फैलाने के लिए नहीं, बल्कि सदियों से अन्याय, जातिगत भेदभाव और सामाजिक अपमान का सामना कर रहे लोगों को स्वाभिमान, समानता और सम्मान के साथ जीने का रास्ता दिखाने के लिए था।
बाबासाहेब का जीवन स्वयं संघर्ष की एक मिसाल था। बचपन से ही उन्होंने जाति के नाम पर होने वाला भेदभाव देखा और सहा। प्रतिभा, शिक्षा और योग्यता होने के बावजूद उन्हें केवल जन्म के कारण अपमानित किया गया। सार्वजनिक स्थानों पर पानी पीने से लेकर शिक्षा प्राप्त करने तक, उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। उन्होंने अपनी पीड़ा को समाज की मुक्ति का संकल्प बनाया और ज्ञान को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
विदेशों से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बाबासाहेब अपने समाज की पीड़ा को नहीं भूले। उनका संघर्ष व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं था। वे चाहते थे कि जिस अपमान और अन्याय से उन्हें गुजरना पड़ा, आने वाली पीढ़ियों को उसका सामना न करना पड़े। उनका सपना ऐसा भारत बनाना था, जहां किसी व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके गुणों, कर्मों और मानवीय मूल्यों से हो।
साल 1927 में महाड़ के चवदार तालाब सत्याग्रह के माध्यम से बाबासाहेब ने सार्वजनिक पानी पर सभी मनुष्यों के समान अधिकार की आवाज बुलंद की। उन्होंने मनुस्मृति दहन के माध्यम से जातिगत असमानता को उचित ठहराने वाली मान्यताओं के विरुद्ध अपना विरोध व्यक्त किया। मंदिर प्रवेश आंदोलन और अन्य सामाजिक आंदोलनों के जरिए उन्होंने स्पष्ट किया कि इंसान को सम्मान के साथ जीने के लिए किसी की दया नहीं, बल्कि अपने अधिकार चाहिए।
1935 में येवला में बाबासाहेब ने घोषणा की थी कि वे हिंदू के रूप में जन्मे हैं, लेकिन हिंदू के रूप में मृत्यु नहीं स्वीकार करेंगे। यह घोषणा अचानक लिया गया फैसला नहीं थी। इसके पीछे वर्षों का अनुभव, गहरा अध्ययन, सामाजिक व्यवस्था का विश्लेषण और अपने समाज के भविष्य की चिंता थी। वे समझ चुके थे कि केवल राजनीतिक अधिकार प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है, जब तक समाज में जन्म के आधार पर ऊंच-नीच और भेदभाव की मानसिकता बनी रहती है।
बाबासाहेब ने विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया। उन्होंने धर्म को केवल पूजा-पाठ और कर्मकांड के रूप में नहीं देखा, बल्कि यह समझने का प्रयास किया कि कौन-सा मार्ग मनुष्य को स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और नैतिक जीवन की प्रेरणा देता है। भगवान बुद्ध की शिक्षाओं में उन्हें विवेक, करुणा, प्रज्ञा और मानव कल्याण का ऐसा मार्ग दिखाई दिया, जो उनके सामाजिक दर्शन के अनुकूल था।
और फिर आया 14 अक्टूबर 1956 का वह ऐतिहासिक दिन, जब नागपुर की दीक्षाभूमि पर भदंत चंद्रमणी महास्थवीर के हाथों डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण की। उनकी पत्नी सविताबाई आंबेडकर भी इस ऐतिहासिक अवसर पर उनके साथ थीं। इसके बाद बाबासाहेब ने अपने अनुयायियों को धम्म की दीक्षा दी। इस ऐतिहासिक समारोह में लगभग पांच लाख लोगों की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है।
उस दिन दीक्षाभूमि पर केवल धर्म परिवर्तन नहीं हुआ था, बल्कि सदियों से दबाए गए आत्मसम्मान ने एक नई आवाज पाई थी। जिन लोगों को लंबे समय तक सामाजिक रूप से हीन समझा गया, वे अपने जीवन की दिशा स्वयं चुनने के लिए एकत्र हुए थे। उनके मन में बेहतर भविष्य की आशा थी, और उनके सामने एक ऐसे समाज का सपना था जिसमें किसी को भी जन्म के कारण अपमानित न होना पड़े।
बाबासाहेब ने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलाईं। इन प्रतिज्ञाओं का उद्देश्य केवल कुछ धार्मिक मान्यताओं का त्याग करना नहीं था, बल्कि जीवन को विवेक, नैतिकता और समानता के आधार पर ढालना था। उन्होंने अपने अनुयायियों को उन मान्यताओं और कर्मकांडों से दूर रहने का संकल्प दिलाया, जिन्हें वे जातिगत असमानता से जुड़ा हुआ मानते थे। साथ ही उन्होंने बुद्ध, धम्म और संघ के मार्ग पर चलने, सभी मनुष्यों को समान मानने और अपने जीवन में करुणा तथा नैतिक आचरण अपनाने की प्रेरणा दी।
इन 22 प्रतिज्ञाओं का मूल संदेश आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मनुष्य की श्रेष्ठता उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके विचारों और आचरण से तय होनी चाहिए। किसी को भी जाति के आधार पर छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए। समाज में सम्मान, अधिकार और अवसर सभी को समान रूप से मिलने चाहिए। बाबासाहेब चाहते थे कि उनका समाज केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि विचारों और व्यवहार में भी स्वतंत्र बने।
उनके इस निर्णय का विरोध भी हुआ और अनेक लोगों ने इसकी आलोचना की। धर्मांतरण के सामाजिक और राजनीतिक परिणामों को लेकर भी चर्चाएं हुईं। लेकिन बाबासाहेब अपने विचारों के प्रति दृढ़ रहे। उन्होंने अपने जीवन में बार-बार यह दिखाया कि किसी निर्णय का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि उसका विरोध कितने लोग कर रहे हैं, बल्कि इस बात से तय होता है कि वह निर्णय न्याय, विवेक और मानवीय गरिमा की कसौटी पर कितना खरा उतरता है।
बाबासाहेब का संघर्ष केवल धर्मांतरण तक सीमित नहीं था। उन्होंने शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, महिलाओं के अधिकार और आर्थिक न्याय के लिए भी अपना जीवन समर्पित किया। उनका प्रसिद्ध संदेश, “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो,” आज भी समाज को जागरूक करने की शक्ति रखता है। वे जानते थे कि अशिक्षा और अज्ञानता मनुष्य को उसके अधिकारों से दूर कर देते हैं। इसलिए उन्होंने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का सबसे प्रभावशाली साधन माना।
भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका ने देश को समानता और न्याय की दिशा में आगे बढ़ाने का आधार दिया। संविधान के अनुच्छेद 17 ने अस्पृश्यता को समाप्त घोषित किया। कानून के सामने समानता, मौलिक अधिकार और सामाजिक न्याय के संवैधानिक आदर्शों को मजबूत करने में बाबासाहेब का योगदान ऐतिहासिक रहा। वे केवल एक समुदाय के अधिकारों की बात नहीं करते थे, बल्कि ऐसे भारत का निर्माण चाहते थे जहां हर नागरिक को सम्मान और न्याय मिले।
बाबासाहेब का स्पष्ट विचार था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है, जब समाज में भी लोकतांत्रिक मूल्य स्थापित हों। यदि एक ओर हम समानता की बात करें और दूसरी ओर जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव करें, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाएगा। उनके लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुता केवल भाषणों के शब्द नहीं थे, बल्कि एक न्यायपूर्ण राष्ट्र की बुनियाद थे।
आज अशोक विजयादशमी के अवसर पर हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हम वास्तव में बाबासाहेब के विचारों को अपने जीवन में उतार रहे हैं? क्या हम जातिगत भेदभाव से मुक्त समाज बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं? क्या हम महिलाओं का सम्मान करते हैं, कमजोर और वंचित लोगों के अधिकारों के लिए खड़े होते हैं और अंधविश्वास के स्थान पर विवेक को महत्व देते हैं? यदि नहीं, तो हमें केवल बाबासाहेब की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके विचारों को अपने आचरण में भी अपनाना चाहिए।
बाबासाहेब का वास्तविक सम्मान तभी होगा, जब किसी गरीब बच्चे को शिक्षा से वंचित न रहना पड़े, किसी व्यक्ति को जाति के कारण अपमानित न होना पड़े, किसी महिला के अधिकारों का हनन न हो और किसी भी नागरिक को न्याय पाने के लिए अपनी सामाजिक पहचान की कीमत न चुकानी पड़े।
दीक्षाभूमि की ऐतिहासिक धम्मक्रांति हमें याद दिलाती है कि समाज में परिवर्तन की शुरुआत विचारों से होती है। जब मनुष्य अपने अधिकारों को पहचानता है, अन्याय के सामने झुकने से इनकार करता है और विवेक के आधार पर अपना रास्ता चुनता है, तभी एक नई सामाजिक चेतना जन्म लेती है।
आइए, इस अशोक विजयादशमी पर हम संकल्प लें कि जातिगत भेदभाव नहीं करेंगे, अन्याय के सामने मौन नहीं रहेंगे, संविधान के मूल्यों का सम्मान करेंगे और समाज में शांति, समानता तथा भाईचारा स्थापित करने के लिए अपना योगदान देंगे। भगवान बुद्ध की करुणा, बाबासाहेब की प्रज्ञा और भारतीय संविधान के आदर्शों को अपने जीवन का मार्ग बनाएं।
बाबासाहेब का सपना किसी एक समाज की उन्नति तक सीमित नहीं था। उनका सपना ऐसा भारत था, जहां हर इंसान को इंसान समझा जाए, हर नागरिक को समान अधिकार मिले और न्याय केवल किताबों में नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई दे।
यही दीक्षाभूमि की धम्मक्रांति का संदेश है। यही बाबासाहेब के विचारों की वास्तविक शक्ति है। और यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अशोकविजयादशमी,धम्मचक्र प्रवर्तन दिन की हार्दिक शुभकामनाएं!






