कई दिनों से पेट में अनाज का एक दाना न गया हो, तो इंसान का पस्त हो जाना सामान्य-सी बात है।
उससे भोजन खाकर तुरंत खड़े होकर काम में जुट जाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सिर्फ़ इसलिए कि वो ग़रीब है?
माई की आदत थी किसी बेसहारा की मदद करना। उनका मानना था कि इंसान ईश्वर की अनमोल कृति है। किसी को ख़ुशियां नसीब होती हैं, तो किसी के हिस्से परेशानियां आती हैं। हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम यथासंभव मदद करें। माई बहुत चाहती थीं कि बचा हुआ खाना फेंकने के बजाय सामने पेड़ के नीचे बैठे व्यक्ति को दे दिया जाए। काफ़ी दिनों से भूखा लग रहा था। इस तरह खाना बर्बाद भी नहीं होगा और किसी भूखे को भोजन भी मिल जाएगा। बाहर फेंकने से क्या फ़ायदा। और फिर जाने-अनजाने पुण्य का काम भी हो जाएगा। लेकिन सभी उसे पागल समझते थे। माई के घर वाले भी उससे घृणा करते थे। कहते- ‘बेकार में क्यों किसी को मुंह लगाएं। एक दिन खाना दिया तो वह सीधा घर तक आ जाएगा। फ़ालतू में परेशान करेगा। फिर तो वह कंबल और कपड़े भी मांगने लगेगा।’ पर माई का दिल नहीं माना। एक दिन माई चुपके से उसे खाना-पानी दे आईं। साथ में ओढ़ने और पहनने के लिए भी। अब तो माई का हमेशा का नियम बन गया। सुबह और शाम का खाना उसे दे आतीं। अब वह कपड़े भी साफ़-सुथरे पहनने लगा था। लगता नहीं कि वह कोई पागल हो। माई से इस तरह हमेशा ही मुफ्त में खाना लेना उसे अब अच्छा नहीं लगता। अब उसे शर्म महसूस होने लगी। उसे लगने लगा अब मुझे भी कुछ काम करना चाहिए। काम करके खाऊंगा तो एक अलग ही आनंद महसूस करूंगा। एक दिन सुबह के समय माई के उठने से पहले ही वह आ गया। घर के आगे सफ़ाई करने लगा। झाड़ू से सारा कचरा एक जगह जमा करने लगा। माई ने देखा घर और बाहर एकदम साफ़ लग रहा था। माई बहुत ख़ुश हुईं। वह सामने खड़ा मंद-मंद मुस्करा रहा था। दौड़कर माई के पैर छुए और कहने लगा- ‘माई, आपके प्यार और दया ने मेरा जीवन बदल दिया। अब मैं मांगकर खाने के बजाय कुछ काम करना चाहता हूं। कभी किसी की गाड़ी की सफ़ाई तो कभी घर की सफ़ाई। कभी किसी के यहां मज़दूर बनकर भी चला जाऊंगा।’ सुनकर माई ख़ुश हो गईं। माई बहुत ख़ुश थीं कि आज उनकी सामान्य-सी सहायता से किसी का जीवन बदल गया।






